बीत जाती है उमर
और तरस जाती है अंखियाॅ
तब तलक सोते ना थे
सुन ना ले अम्मा की बतियाॅ
घूर कर गुस्से से तकना
रो कर फिर गले से लगाना
खिला पिला हमको सुला
बाबा की फिर राह तकना
गीत ना आता था उसको
बातों से मन रहती थी
टुटे मन के हर कोने मे
नया ऊजाला भरती थी
पूछ कर कोई जो देखे
हॅस के आंसू पोछे थे
अम्मा ने अपने दिल में
सपने संजोए रखे थे
चाह ना थी आसमां की
घर की छत मे खुश रही
जब तलक थी जिंदगी
अपनों की खुशी मे रही
ढुॅढती अब भी है तुझको
मेरे मन की हर खुशी
एक बार आके जो कह दे
मै खुश हुई मै खुश हुई।।
आशुतोष पाण्डेय
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