Jindagi ke Rang
My Poems from bottom of my heart will success if touches part of any one's heart
रविवार, 29 दिसंबर 2019
कुछ-कुछ
बुधवार, 15 मई 2019
कितना खुन बहेगा
मंगलवार, 19 सितंबर 2017
जय माता दी
गया न कोई खाली
हाथ जोड़ तू भी विनती करले
भरेगी तेरी झोली।।
दूर दूर तक नजर ना आए
जब कोई भी सहारा
तूझको याद नही अबभी
मैय्या को कब तू पुकारा
तेरे बिगडे काम बनाने
तेरा सोया भाग जगाने
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
कोई ना थामे हाथ तेरा
जब ठोकर लग जाए
फिरता यहाँ वहाँ ना जाने
दर दर हाथ पसारे
अपनी मैय्या को एक बार
जो तूने पूकारा होता
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
मन अपने ठान ले तू
मैय्या को अपना जान ले
अपना पराया कोई नही
मैय्या को अपना मान ले
सुख दुख अपना भूल कर
मैय्या का गुणगान ले
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
जयकारा मेरी मैय्या का
बोल साचे दरबार की जय
जय माता दी
आशुतोष पाण्डेय
सोमवार, 18 सितंबर 2017
यादें
जब घुमता हूँ शहर की तपती सड़क परगाँव की वह पगडंडी बहुत याद आती है।
जब जब अकेले में रोता हूँ
माँ की लोरी बहुत याद आती है।
मिलती नही है जब धूप में कही छाया
दूर कहीं एक अमराई बहुत याद आती है।
दौड़ते दौड़ते जब थक जाते हैंपाँव
दादी की नसीहत ही पुचकारती है ।
भरी भीड़ मे जब अकेला होता हूँ
दोस्तों के किस्से बहुत याद आते हैं।
किस लिए दौड़ रहें हैं सभी
बिना किए परवाह किसी की
कहीं तो होगा मुकाम
इस अनचाही दौड़ का विराम
आ जाते हैं जब आँख में आंसु
बाबुजी का गमछा बहुत याद आता है।
आशुतोष पाण्डेय
बुधवार, 16 अगस्त 2017
खुदरंग
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं
ढूॅढ रहा खुदरंग मैं तो
दुनिया के बाजार में।।
मिले बहुत ही मुझको
जिसकी खनक पर
सब फीके पड जाए
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
भेद पकड़ नही आवे
सुमन सुगंध को जो पहचाने
वो भ्रमर कहाँ से लावे
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
अपने ईमान का सच्चा
अपनी अलग ही दुनिया का
वो तो मुसाफिर विरला
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं ।।
शनिवार, 12 अगस्त 2017
जिंदगी
_*जिंदगी*_
बहुत अरसे से हमको आजमा रही है जिंदगी
अपने हर रूप दिखा रही है जिंदगी।।
हमको नही थी पहचान अपने पराए की
पर हर किसी से पहचान करा रही है जिंदगी।
गौर ना किया कभी जिंदगी के पहलुओं पर
मुड़ मुड़ के देखना मेरी आदत नही
सोचा ना था कभी इस मोड़ से देखुॅगा इसे
हर मोड़ पर हमको घुमा रही है जिंदगी।।
कुछ मेरे ऊसूल थे कुछ लोगों के कानून
कुछ हसरतें मेरी कुछ ख्वाहिशें सबकी
कुछ करम अपना भी कुछ सबकी इनायतें
अब जा कर जीना सिखा रही है जिंदगी।।
आशुतोष पाण्डेय
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
समझ
सवालों की रहगुजर से
जबाबों के मोड़ तक
गर इश्क हो बदनाम तो
कोई बात नही
उठने लगे गर ऊंगलियां
रिश्तों की पाकिजगी पर
उस मोड़ से फिर एक बार
मुड़ जाना जरूरी है।।
दोस्ती का हर रूतबा
इनायते खुदा है
हर जज्बा मोहब्बत का
रहमते खुदा है
तारीख है गवाह सदियों से
मोहब्बत हुई कुर्बान
कुर्बानी दी है दोस्ती ने
यह है दोस्ती की शान ।
आशुतोष पाण्डेय