रविवार, 29 दिसंबर 2019

कुछ-कुछ

अपने अपने हिस्से का प्यार 
सबने छुपा कर रखा है 
कुछ प्यार  मोहब्बत की बातें 
कुछ नफरत वाली सौगातें
कुछ अनचाहे  जजबातो को
सबने दबा कर रखा है ।।
कुछ अनकही सी यादें 
कुछ  भुली बिसरी सी बातें 
कुछ अपनों  की कुछ बेगानों की
कुछ गुजरे हुए जमाने की
कुछ पल सुनहरे वादों के
सबने संजो कर रखा  है।।
कुछ हुए उजागर अपनों में 
कुछ रह गए बस सपनों में 
कुछ बन कर शुल चुभते हैं 
कुछ फुल बन कर झरते है
कुछ ऐसी अनचाही चाहत को
सबने गला घोंट कर रखा है।।
कुछ कहा सुनी हमरी तुमरी
कुछ तीखे बान शब्दों  के
कुछ किस्से कुछ किरदारों के
कुछ भुले हुए वादों  के
एक छोटी  सी महाभारत को
मन में  लिख कर रखा है।।
आशुतोष पाण्डेय 




बुधवार, 15 मई 2019

कितना खुन बहेगा

कितना खुन बहेगा
और कब तक खुन बहेगा
पूछ रही है हर माता
हाथों में अस्थी  कलश लेकर
चुन चुन कर खत्म करो गद्दार
अब तो जागो मेरे यार।।
बलिदानों की धरती पर
व्यर्थ ना जाए ये बलिदान
शीश शत्रु का मांग रहा
फिर से आज हिंदुस्तान
इसका बदला ना ले पाए
तो जीना है बेकार।।अब तो जागो मेरे यार।।
छुपे हुए इन गद्दारों को
ऐसा सबक सिखाना है
भारत का खुन सफेद नहीं
यह उनको बतलाना है
आतंकी आकाओं को
कर देना है तार-तार।।अब तो जागो मेरे यार।।
आशुतोष पाण्डेय।।

मंगलवार, 19 सितंबर 2017

जय माता दी

 
माता रानी के दरबार से
गया कोई खाली
हाथ जोड़ तू भी विनती करले
भरेगी तेरी झोली।।
दूर दूर तक नजर ना आए
जब कोई भी सहारा
तूझको याद नही अबभी
मैय्या को कब तू पुकारा
तेरे बिगडे काम बनाने
तेरा सोया भाग जगाने
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
कोई ना थामे हाथ तेरा
जब ठोकर लग जाए
फिरता यहाँ वहाँ ना जाने
दर दर  हाथ पसारे
अपनी मैय्या को एक बार
जो तूने पूकारा होता
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
मन अपने ठान ले तू
मैय्या को अपना जान ले
अपना पराया कोई नही
मैय्या को अपना मान ले
सुख दुख अपना भूल कर
मैय्या का गुणगान ले
मैय्या दौडी चली आएगी
तू करले एक जयकारा।।
जयकारा मेरी मैय्या का
बोल साचे दरबार की जय
जय माता दी
आशुतोष पाण्डेय

सोमवार, 18 सितंबर 2017

यादें

जब घुमता हूँ शहर की तपती सड़क पर
गाँव की वह पगडंडी बहुत याद आती है।
जब जब अकेले में रोता हूँ
माँ की लोरी बहुत याद आती है।
मिलती नही है जब धूप में कही छाया
दूर कहीं एक अमराई बहुत याद आती है।
दौड़ते दौड़ते जब थक जाते हैंपाँव
दादी की नसीहत ही पुचकारती है ।
भरी भीड़ मे जब अकेला होता हूँ
दोस्तों के किस्से बहुत याद आते हैं। 
किस लिए दौड़ रहें हैं सभी
बिना किए परवाह किसी की
कहीं तो होगा मुकाम
इस अनचाही दौड़ का विराम
आ जाते हैं जब आँख में आंसु
बाबुजी का गमछा बहुत याद आता है।
आशुतोष पाण्डेय

बुधवार, 16 अगस्त 2017

खुदरंग

खुदरंग
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं
ढूॅढ रहा खुदरंग मैं तो
दुनिया के बाजार में।।
झूठ फरेब का लगा मुलम्मा
मिले बहुत ही मुझको
जिसकी खनक पर
सब फीके पड जाए
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
कौन है असली नकली
भेद पकड़ नही आवे
सुमन सुगंध को जो पहचाने
वो भ्रमर कहाँ से लावे
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
अपनी धुन का पक्का
अपने ईमान का सच्चा
अपनी अलग ही दुनिया का
वो तो मुसाफिर विरला
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं ।।
आशुतोष पाण्डेय

शनिवार, 12 अगस्त 2017

जिंदगी

_*जिंदगी*_
बहुत अरसे से हमको आजमा रही है जिंदगी
अपने हर रूप दिखा रही है जिंदगी।।
हमको नही थी पहचान अपने पराए की
पर हर किसी से पहचान करा रही है जिंदगी।

गौर ना किया कभी जिंदगी के पहलुओं पर
मुड़ मुड़ के देखना मेरी आदत नही
सोचा ना था कभी इस मोड़ से देखुॅगा इसे
हर मोड़ पर हमको घुमा रही है जिंदगी।।

कुछ मेरे ऊसूल थे कुछ लोगों के कानून
कुछ हसरतें मेरी कुछ ख्वाहिशें सबकी
कुछ करम अपना भी कुछ सबकी इनायतें
अब जा कर जीना सिखा रही है जिंदगी।।

आशुतोष पाण्डेय��

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

समझ

सवालों की रहगुजर से
जबाबों के मोड़ तक
गर इश्क हो बदनाम तो
कोई बात नही
उठने लगे गर ऊंगलियां
रिश्तों की पाकिजगी पर
उस मोड़ से फिर एक बार
मुड़ जाना जरूरी है।।
दोस्ती का हर रूतबा
इनायते खुदा है
हर जज्बा मोहब्बत का
रहमते खुदा है
तारीख है गवाह सदियों से
मोहब्बत हुई कुर्बान
कुर्बानी दी है दोस्ती ने
यह है दोस्ती की शान ।
आशुतोष पाण्डेय