यादें
जब घुमता हूँ शहर की तपती सड़क परगाँव की वह पगडंडी बहुत याद आती है।
जब जब अकेले में रोता हूँ
माँ की लोरी बहुत याद आती है।
मिलती नही है जब धूप में कही छाया
दूर कहीं एक अमराई बहुत याद आती है।
दौड़ते दौड़ते जब थक जाते हैंपाँव
दादी की नसीहत ही पुचकारती है ।
भरी भीड़ मे जब अकेला होता हूँ
दोस्तों के किस्से बहुत याद आते हैं।
किस लिए दौड़ रहें हैं सभी
बिना किए परवाह किसी की
कहीं तो होगा मुकाम
इस अनचाही दौड़ का विराम
आ जाते हैं जब आँख में आंसु
बाबुजी का गमछा बहुत याद आता है।
आशुतोष पाण्डेय
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