शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

समझ

सवालों की रहगुजर से
जबाबों के मोड़ तक
गर इश्क हो बदनाम तो
कोई बात नही
उठने लगे गर ऊंगलियां
रिश्तों की पाकिजगी पर
उस मोड़ से फिर एक बार
मुड़ जाना जरूरी है।।
दोस्ती का हर रूतबा
इनायते खुदा है
हर जज्बा मोहब्बत का
रहमते खुदा है
तारीख है गवाह सदियों से
मोहब्बत हुई कुर्बान
कुर्बानी दी है दोस्ती ने
यह है दोस्ती की शान ।
आशुतोष पाण्डेय

कलयुग

ना ही यशोदा ना ही कन्हैया
ना ही देवकी मैय्या
नही मिलते नही मिलते
इस कलयुग मे ओ भैय्या।।
कौन है अपना कौन पराया
अब तो कैसे जाने हो
किस भरम भरमाए हो
अपनों को अपनाए हो
टुट जाएगा टुट जाएगा
हर भरम मेरे भैय्या।।
गैरो की खातिर जान लूटा
अपनों का करके बलिदान
ममता का जो मोल बढ़ा दे
ममता का करके बलिदान
नही मिलते नही मिलते
इस कलयुग मे ओ भैय्या।।

मेरे दोस्त

जिक्र तो मेरा भी खुब होता है
मेरे रकीबो मे
मेरे हबीबो मे
बता दो लिखा है कहाॅ  मेरा नाम
तेरे रकीबो मे
तेरे हबीबो मे ।।

किसी किसी को ही यह
रूतबा नसीब होता है
वरना कोई इस कदर
किसके करीब होता है
बिठा लिया है जो तुमने
दिल के किसी कोने मे
शफे वो कौनसी है
तेरे रकीबो मे
या तेरे हबीबो मे ।।

जमाने भर की शिकायत
को आज दूर करो
अपने दिल को आज
इस कदर मजबूर करो
रहे ना बाकी कोई गिला
ना आज कोई रूसवा हो
जगा दो आस कोई फिर
तेरे रकीबो मे
तेरे हबीबो मे ।।

दुआ हमारी हो कबुल
ऐसा तो कोई वक्त आए
शुमार खुशनसीबो मे
कभी तो अपना नाम आए
कभी तो महसूस करे
हम भी जमाने का रक्श
उठे फिर अपना चर्चा
मेरे रकीबो मे
मेरे हबीबो मे ।।
��आशुतोष पाण्डेय��

रविवार, 2 जुलाई 2017

अम्मा

[12:00am, 03/07/2017] Ashutosh Pandey: बीत जाती है उमर
और तरस जाती है अंखियाॅ
तब तलक सोते ना थे
सुन ना ले अम्मा की बतियाॅ

घूर कर गुस्से से तकना
रो कर फिर गले से लगाना
खिला पिला हमको सुला
बाबा की फिर राह तकना

गीत ना आता था उसको
बातों से मन रहती थी
टुटे मन के हर कोने मे
नया ऊजाला भरती थी

पूछ कर कोई जो देखे
हॅस के आंसू पोछे थे
अम्मा ने अपने दिल में
सपने संजोए रखे थे

चाह ना थी आसमां की
घर की छत मे खुश रही
जब तलक थी जिंदगी
अपनों की खुशी मे रही
ढुॅढती अब भी है तुझको
मेरे मन की हर खुशी
एक बार आके जो कह दे
मै खुश हुई मै खुश हुई।।

सभी माताओं को समर्पित

आशुतोष पाण्डेय

अम्मा

बीत जाती है उमर
और तरस जाती है अंखियाॅ
तब तलक सोते ना थे
सुन ना ले अम्मा की बतियाॅ

घूर कर गुस्से से तकना
रो कर फिर गले से लगाना
खिला पिला हमको सुला
बाबा की फिर राह तकना

गीत ना आता था उसको
बातों से मन रहती थी
टुटे मन के हर कोने मे
नया ऊजाला भरती थी

पूछ कर कोई जो देखे
हॅस के आंसू पोछे थे
अम्मा ने अपने दिल में
सपने संजोए रखे थे

चाह ना थी आसमां की
घर की छत मे खुश रही
जब तलक थी जिंदगी
अपनों की खुशी मे रही
ढुॅढती अब भी है तुझको
मेरे मन की हर खुशी
एक बार आके जो कह दे
मै खुश हुई मै खुश हुई।।

आशुतोष पाण्डेय