बुधवार, 16 अगस्त 2017

खुदरंग

खुदरंग
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं
ढूॅढ रहा खुदरंग मैं तो
दुनिया के बाजार में।।
झूठ फरेब का लगा मुलम्मा
मिले बहुत ही मुझको
जिसकी खनक पर
सब फीके पड जाए
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
कौन है असली नकली
भेद पकड़ नही आवे
सुमन सुगंध को जो पहचाने
वो भ्रमर कहाँ से लावे
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं।।
अपनी धुन का पक्का
अपने ईमान का सच्चा
अपनी अलग ही दुनिया का
वो तो मुसाफिर विरला
मिला नही वो मुझको
जिसको ढूॅढ रहा हूॅ मैं ।।
आशुतोष पाण्डेय

शनिवार, 12 अगस्त 2017

जिंदगी

_*जिंदगी*_
बहुत अरसे से हमको आजमा रही है जिंदगी
अपने हर रूप दिखा रही है जिंदगी।।
हमको नही थी पहचान अपने पराए की
पर हर किसी से पहचान करा रही है जिंदगी।

गौर ना किया कभी जिंदगी के पहलुओं पर
मुड़ मुड़ के देखना मेरी आदत नही
सोचा ना था कभी इस मोड़ से देखुॅगा इसे
हर मोड़ पर हमको घुमा रही है जिंदगी।।

कुछ मेरे ऊसूल थे कुछ लोगों के कानून
कुछ हसरतें मेरी कुछ ख्वाहिशें सबकी
कुछ करम अपना भी कुछ सबकी इनायतें
अब जा कर जीना सिखा रही है जिंदगी।।

आशुतोष पाण्डेय��